भगवान महावीर जन्मे थे बासोकुंड में

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-उनके कई यादे वहा मौजूद
मुजफ्फरपुर में कई महापुरुषो ने जन्म लिए है, लेकिन उनकी यादे धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रही है, शहर से 25 किलो मीटर दूर सरैया प्रखंड में एक गांव का नाम बासोकुंड है, जहा भगवान महावीर ने जन्म लिए, ग्रामीणों ने बताया कि भगवान महावीर का जन्म जैनधर्म के 24 वे काल में यहा हुआ। उनके नाम पर यहा के जैनधर्मावलंबियों द्वारा प्रत्येक साल पूजा का एक भव्य आयोजन करते है, प्रत्येक साल आयोजित होने वाले कार्यक्रम में देश के कई नामचीन हस्तियां शामिल होते है, लेकिन प्रशासन की उपेक्षा के कारण उनके तीर्थस्थल जंगलो से धिर गए है, सरेैया में उनके दर्शन के लिए कई वार श्रीलंका के राष्टपति और प्रधान मंत्री भी आ चुके है, बासोकुंड के सटे कुसी एक गांव है, जहां कई ऐसे कुंए है, जिसकी नक्काशी वहा भगवान महावीर का जन्म होने की दावे को पुष्ट करता है, 30 साल वाले उस गांव के एक 70 वर्षीय बुर्जुग ने तत्कालीन जिलाधिकारी देवाशीष गुप्त मिले थे, उन्होंने वहा भगवान महावीर का जन्म होने का कई दावे पेश किए, तत्कालीन डीएम उनके दावे की पुष्टता के लिए अधिकारियों के दल के साथ कुसी ग्राम गए तो कई ऐसे प्राचीन निर्माणों को देखकर आश्चर्य चकित हो गए, तत्कालीन डीएम ने साथ गए अधिकारियों को प्राचीन काल में निर्मित हुए सभी कुंओ का जिर्णोद्धार करने का आदेश तो दिए, लेकिन इसीबीच उनका तबादला हो गया और उनके सारे आदेश हवा में रह गए, उनके जाने के बाद कई डीएम आए और गए, लेकिन किसी ने उस अपूर्ण खुदाई पर ध्यान नही दी, आज भी सरैया की यह धरती जैनधर्म के लोगो के लिए अत्यंत पूजनीय है, वहा के कुछ पुराने बुजूर्गो ने बताया कि इस पवित्र भूमि पे ईशा पूर्व 599 में चैत्र त्रियोदशी को राजा सिद्धार्थ के छोटे पुत्र के रुप में भगवान ने जन्म लिया था। उस समय यह क्षेत्र प्रजातांत्रिक वैशाली के नाम से जाना जाता था, इसके अंदर 7707 उपनगर थे, जिसमें एक कुंडाग्राम भी था। भगवान के पास बुद्धि काफी थे, इसलिए उनका नाम पहले वर्दमान महावीर रखा गया। राजा के पुत्र होने के बाद भी उन्हें राज महल का सुख रास नही आया, महज वे 30 साल के उम्र में ही महल को त्याग दिए और वन की ओर कुच कर गए, वन पहुंचने के बाद भगवान कठोर तपस्या में लीन हो गए, उनकी तपस्या 12 बर्षो तक चली, तब उन्हें ज्ञान मिली, भगवान महावीर ने वही से विश्व को अहिंसा परमो धर्म का अह्वान किया, वनो से उन्होंने लोक कल्याण के लिए कई संदेश दिए और 72 वर्ष की उम्र में वे पावापुरी पहुंच गए। उनकी मृत्यु 527 ईशा पूर्व में हो गयी।

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