संबद्ध कॉलेजों में करोड़ों रुपए का अनुदान हवा में उड़ गया

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शिक्षा विभाग ने दिया जांच का आदेश

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राज्य सरकार संबद्ध डिग्री कॉलेज के कर्मचारियों को वेतन के लिए करोड़ों रुपए का अनुदान देती है, लेकिन वितरण के दौरान आधे से ज्यादा पैसे हवा में उड़ जाते हैं, इस खुलासे ने मुजफ्फरपुर के श्यामनंदन सहाय कॉलेज के अनुदान वितरण पर उठाए गए सवालों को रौशनी में लाया है। कॉलेज ने वैसे कर्मचारियों को अनुदान श्रेणी में रख दिया है, जिनके पदों को सरकार ने 1991 में स्वीकृत नहीं किया है, कॉलेज प्रबंधन ने एक खास को लाभ पहुंचाने के लिए इंटर और डिग्री के अनुदान वितरण के दौरान यह खिलवाड़ किया है, 1991 के कर्मचारी को अनुदान वितरण के दौरान प्राथमिकता का लाभ देते हुए राशि दे दी है। हालांकि सरकार ने इस मामले की जांच का आदेश दिया है, जांच होने पर बड़े-बड़े घोटालों का पता चलेगा। सूत्रों के मुताबिक, ऐसे कई संबद्ध डिग्री कॉलेज हैं जो अनुदान वितरण के दौरान जमकर मनमानी कर रहे हैं। अनुदान वितरण के लिए सरकार ने जो नियम दिए हैं, उसके अनुसार विशेषज्ञों और कर्मचारियों को अनुदान देना होता है, सरकार ने जिन पदों को मंजूरी दी है, लेकिन अधिकांश कॉलेजों ने सरकार के उक्त नियमों के खिलाफ अनुदान वितरण किया है। और इसके अलावा, सरकार कॉलेजों को कर्मचारियों के लिए जो अनुदान देती है, वहां के प्रबंधक कर्मचारियों को उनके हक के अनुसार पैसे नहीं देती है। कई कॉलेजों ने अनुदान वितरण के दौरान प्राथमिकता का भी ख्याल नहीं रखा है, प्रबंधन अपने पसंदीदा कर्मचारियों को ज्यादा पैसे देने के लिए वितरण प्रक्रिया को दरकिनार कर दिया है, जो वितरण व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल है। सूत्रों के अनुसार, उस कॉलेज में दो कर्मचारी हैं जिन्होंने कर्मचारियों के हकों का उल्लंघन किया है और एक दो मंजिले मकान खरीद लिया है, हालांकि शिकायत के आलोक में राज्य के शिक्षा विभाग ने ऐसे कई मुद्दों पर संबद्ध डिग्री कॉलेजों की जांच कराने का निर्णय लिया है, जिसमें चर्चा है कि मुजफ्फरपुर के एक कॉलेज के प्रभारी प्राध्यापक ने कर्मचारियों के हक का अनुदान तथा परीक्षा कार्य में गड़बड़ी कर शहर में 70 लाख का एक अपार्टमेंट खरीद लिया है, यह मामला भी शिक्षा विभाग के संज्ञान में है, विभाग ने अधिकारियों को इस मामले की भी जांच कराने का आदेश दिया है, विभाग के इस निर्णय के बाद मुजफ्फरपुर के एक संबद्ध कॉलेज में हड़कंप है। कहा जाता है कि विवि कॉलेजों को पार्ट वन, टू और थ्री की सेंटर तो देती है, लेकिन इसमें भी जमकर मनमानी की जाती है, नियमित कॉलेजों को विशेषज्ञों से गार्ड करवाना होता है, लेकिन कमाई के लिए ऐसा नहीं होता है, कॉलेज विशेषज्ञों के बजाय किसी और से गार्ड का काम ले लेते हैं, एक कॉलेज के प्रभारी तो इस काम को आदिकारियों को दिलाने के लिए कई सालों से परीक्षा विभाग का कमांड एक सेवानिवृत कर्मचारी को दे रखा है, कहते हैं कि उस कॉलेज में कर्मचारियों की कमी नहीं है, फिर भी न जाने रिटायरों से क्यों काम लिया जा रहा है, इस ओर अब तक कॉलेज के सचिव का ध्यान क्यों नहीं गया, यह सवाल लोगों के मन में बार-बार उठ रहा है। सूत्र कहते हैं कि नीतीश सरकार ने बिना वितरण संबंधी डिग्री और इंटर कॉलेजों के शिक्षकों और कर्मचारियों के बीच हो रहे विवादों के बाद वर्ष 2008 में वितरण संबंधी शिक्षा नीति को खत्म कर दिया, लेकिन यह कौन जानता था कि सरकार की इस घोषणा संबद्ध डिग्री कॉलेजों के लिए सोने की अंडा देने वाली मुर्गी हो जाएगी, वैसे सरकार गरीब कर्मचारियों के लिए वितरण देती है, लेकिन कुछ कॉलेजों में कर्मचारियों को उनके हक के अनुसार वितरण नहीं मिलते, बताया जाता है कि शहर के एक कॉलेज के प्रभारी प्राध्यापक ने अनुदान में लूट खसोट करने के लिए ऐसे व्यक्ति को लेखापाल बना रखा था, जो कहने के लिए लैब इंचार्य होता था, लेकिन वे कॉलेज के सभी कामों का देखभाल करते थे, अगस्त में वे सेवानिवृत हो गए हैं, लेकिन उनका अभी भी कॉलेज में काम चल रहा है।

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